पतझड़ ने सारे रंग बिखरा दिए
फिर बसंत ने उन्ही शाखो पर फूल खिला दिए
वक़्त की धूप ने चेहरे बदल दिए
ख़ामोशी की छाँब ने महल कर लिये
नदी के आईने में ज़ब चुपके से चाँद उतरा
लेहरो ने तो जैसे चमकिले चादर ओढ लिये
रेगिस्तान की धूप में कोई बादल ठेर गया
जिसे प्रेम था बो तपती धूप में भी बरस गया
गुलमोहर की शाख से लाल फूल झड़ते रहें
दोनों हमराही साथ लेकिन फिर भी मौसम बदलते रहे
कुदरत ने हर मौसम मे मिलने का ढंग लिखा
मगर "वक़्त नहीँ " कह कर सब जाने दिया।