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तन्हाई

Sonal Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कल रात बहुत रोई थी वो
        
                                                    
                            
तब जाकर कहीं सोई थी वो
आधी रात एक ख्वाब आया
जिसने नींद से उसे जगाया
चारों ओर फैला काला घना साया
डर कर उसने शोर मचाया
मगर साथ ना किसी का पाया
डरी सी.. एक कोने में खड़ी थी वो
उसकी नजरें ढ़ूढ़ रही थी
तभी सामने से किसी की आहट आई
वो थोड़ा और घबराई
बड़ी मुश्किल से उसने नजरें उठाईं
कुछ ही दूर पर दिख रही थी उसे परछाईं
जो धीरे–धीरे उसके करीब आई
देखा उसने वो खुद डरी सी थी
साहस कर पास गई उसके..
वो कोई और नही
थी उसकी ही ‘तन्हाई’ जिसे
कल रात वो बाहर थी छोड़ आई।
-सोनल यादव


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