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मसला एक और दो का यह,जा ना सका सुलझाया अब तक.

Somesh Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जान बूझकर सच,सपनों से ,हमने दिल बहलाया अब तक.
        
                                                    
                            
शाम ढलेगी अब जल्दी ही, साथ चलेगा साया कब तक?

ख़ामोशी से दबा दिया था, मन की गहराई में जिसको ,
आँखों से निकला है बह कर,दर्द ना जो कह पाया अब तक.

जिसको दिल ने अपना समझा, उसको दोस्त बनाया हमने,
किसने साथ दिया या धोखा, नहीं हिसाब लगाया अब तक.

चला गया दिन और रात भी दरवाजे तक आ पहुंची है ,
छाने लगा अंधेरा भी अब, नहीं चराग जलाया अब तक.

दरिया से क़तरा मिलता है, या क़तरे में ख़ुद दरिया है ?
मसला एक और दो का यह,जा ना सका सुलझाया अब तक.

मेरे पास मोहब्बत ही है, बदले मे देने को तुझको,
करते आये तिज़ारत हम तो, लेकर यह सरमाया अब तक.

क्या उसके रुख़ पर पर्दा है, उसकी ही अपनी ज़ुल्फ़ों का?
या मेरी अपनी नज़रों ने, उसका रूप छिपाया अब तक?
-सोमेश शर्मा
 
21 घंटे पहले
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