विज्ञापन

बेटी की व्यथा

Smita Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            'बेटी की व्यथा''
        
                                                    
                            
एक दिन कहा था मां ने मेरी,
की बेटा तू अब पराई हो गई।
मैंने पूछा क्यू माँ,
तो मेरी लाडो अब तेरी शादी हो गई।
तेरी बेटी बहुत ना समझ है माँ,
वो ये दुनियादारी को क्या जाने।
है बेटा बेटी मैं भेद बड़ा,
वो है बात को भला कैसे माने।
कुछ उलझन जो मेरे मन में है,
तू उसे आज सुलझा दे मां।
जो मन मैं सवाल ढेरों से हैं,
उन सब के जवाब दे देना मां।
जब हुई तेरे बेटे की शादी तो,
एक पराई लड़की भी तेरी अपनी सी हो गई।
और जब की तू मेरी बिदाई तो,
तेरी अपनी ही बेटी तेरे लिए परायी हो गई।
तू ही समझा दे ना माँ,
की आखिर तेरी ही बेटी तेरे लिए पराई कैसे हो गई।
तू तो कहती थी माँ,
कि लाडो तू तो परछाई है मेरी।
तो फिर बोल ना माँ,
तेरी ही परछाई तुझसे जुदा कैसे हो गई।
तू ही समझा देना मां,
कि आखिर बेटी पराई कैसे हो गई।
सीने से लगाके रखती थी जिसे,
उसके अपने हिस्से मैं आज जुदाई कैसे आ गई।
तू ही बता ना माँ मुझे,
कि तेरी बेटी पराई कैसे हो गई।
रखा था जिसे नौ महीने अपनी कोख मैं,
वही बेटी आज किसी ओर के हवाले हो गई।
बोलना माँ,
कि तेरी बेटी पराई कैसे हो गई।
माँ मैं भी तो हूँ ना ख़ून तेरा,
तो क्या रक्त की गहराई मेरी अब कम हो गई।
तू ही समझा देना मां मुझे,
कि आखिर तेरी बेटी पराई कैसे हो गई।
किस्मत के पन्ने पे शायद मेरे,
मेरी मां की लकीर थोड़ी कम हो गई।
इसिलिये शायद माँ
मैं तेरा अपना हिसा होते हुए भी तेरे लिए परायी हो गई......
 
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7364 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13069 कविताएं

View Profile