विज्ञापन

भीष्म पितामह के सरसैया पर उठे भाव और महाभारत

SK Shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अग्रणी पत्रिका अमरउजाला के मेरे अल्फ़ाज़' कॉलम हेतु स्वरचित कविता प्रकाशन के संबंध में निवेदित
        
                                                    
                            
जीवन की मेरी भूमिका अब पूरी हुई,
धर्म की राह पर मेरी यात्रा पूरी हुई।
शरशय्या पर पड़ा हूँ,
पर मन अभी भी जाग रहा है।
मेरे अनुभवों का सूर्य अस्त हो रहा है,
अब तुम्हारे हाथों में नया प्रभात है।

मेरा अध्याय अब समाप्त है,
अब तुम्हारी बारी है आगे लिखने की।
मैंने जो देखा, उससे सीख लेना,
जो भूल हुई, उसे मत दोहराना।
धर्म कठिन हो सकता है,
पर अधर्म कभी स्थायी नहीं होता।
राज्य तुम्हारा है,
निर्णय तुम्हारे हैं,
समय तुम्हारा है—
पर स्मरण रहे,

हर शक्ति का मूल्य उसके सदुपयोग में है।
मैं जा रहा हूँ,
पर मेरे अनुभव तुम्हारे साथ रहेंगे।

मेरी कथा यहाँ समाप्त नहीं होती—
वह तुम्हारे कर्मों में आगे बढ़ेगी।
मेरा अध्याय समाप्त हुआ,
अब तुम अपनी कथा लिखो।

धर्म को आधार बनाकर,
सत्य को दीपक बनाकर,
करुणा को हृदय में रखकर
और कर्तव्य को अपना पथ बनाकर।
यही मेरी अंतिम शिक्षा है—
मनुष्य चला जाता है,
पर उसके कर्म
आने वाली पीढ़ियों में जीवित रहते हैं।"
 
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all