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आधा संस्कार

Siddharth Ray

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अनायास ही
        
                                                    
                            
नजरें झुक जाती हैं
और लाल हो जाता
मासूम चेहरा
देह कांपने लगती है
भूकंप सी
और
शरीर में उठने लगता है
एक ज्वार ,
ज्वलनशील हो जाता है
अशांत हृदय ,
बहने लगता है
एक सा खून
धमनियों और शिराओं में ,
और हाथ हो उठते हैं
क्रांतिकारी ,
पैरों में आ जाती है
चपलता
तथा मस्तिष्क भी
धधकने लगता है ,
और मुंह भर जाता है
विष से,
दग्ध होने लगती हैं
आंखें,
तत्पश्चात इसके
शेष स्थिर रह जाती है
शर्मिन्दगी।
क्योंकि कहीं पर
दबा दी जाती है
किसी की आवाज,
और
आजाद कर दिया जाता है
चीखों को,
उतार दिए जाते हैं
कपड़े और
पहना दिया जाता है
बलात्कार,
लेकिन यहीं पर नहीं रूकता
यह घृणित कृत्य,
और अंततः
कर दिया जाता है
बेशर्म होकर
उसका अंतिम
किंतु
आधा संस्कार। ।

- सिद्धार्थ अजेय


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