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शुबहा का कोई मदावा नहीं होता

Shreyasi Satish

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ख़ुद पास आए ख़ुद दूर हो गए,
        
                                                    
                            
मगर ये तोहमत मेरे सर मढ़ गए।

इल्म नहीं मुझको जिस बात की,
वही बात वो दर- बदर कर गए।

गफ़लत के साथी थे और भी बहुत
उसके ख़्यालातों को पुख़्ता कर गए

शुबहा का कोई मदावा नहीं होता,
मेरे ही अल्फाज़ मुझीसे कह गए।
3 महीने पहले
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