ख़ुद पास आए ख़ुद दूर हो गए,
मगर ये तोहमत मेरे सर मढ़ गए।
इल्म नहीं मुझको जिस बात की,
वही बात वो दर- बदर कर गए।
गफ़लत के साथी थे और भी बहुत
उसके ख़्यालातों को पुख़्ता कर गए
शुबहा का कोई मदावा नहीं होता,
मेरे ही अल्फाज़ मुझीसे कह गए।
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