जब दौर-ए-ख़िजाँ गुज़र गया, अब तुम आ भी गए तो क्या?
जो गुज़रनी थी वह गुज़र चुकी, दर्द-ए-दिल सुनाऊँ भी तो क्या?
शुक्र है इस ठोकर से आख़िर, होश तो आया दिल को मेरे,
पर सोचती हूँ सब खोकर, होश आ भी गया तो क्या?
था अजब हादसा कि अपनों के चेहरे बेनक़ाब हो गए,
वो वहम ही बेहतर था मेरा, अब राज़ खुल भी गया तो क्या?