विज्ञापन

राज़ खुल भी गया तो क्या

Shreyasi Satish

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब दौर-ए-ख़िजाँ गुज़र गया, अब तुम आ भी गए तो क्या?
        
                                                    
                            
जो गुज़रनी थी वह गुज़र चुकी, दर्द-ए-दिल सुनाऊँ भी तो क्या?

शुक्र है इस ठोकर से आख़िर, होश तो आया दिल को मेरे,
पर सोचती हूँ सब खोकर, होश आ भी गया तो क्या?

था अजब हादसा कि अपनों के चेहरे बेनक़ाब हो गए,
वो वहम ही बेहतर था मेरा, अब राज़ खुल भी गया तो क्या?
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all