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राज़ खुल भी गया तो क्या

                
                                                         
                            जब दौर-ए-ख़िजाँ गुज़र गया, अब तुम आ भी गए तो क्या?
                                                                 
                            
जो गुज़रनी थी वह गुज़र चुकी, दर्द-ए-दिल सुनाऊँ भी तो क्या?

शुक्र है इस ठोकर से आख़िर, होश तो आया दिल को मेरे,
पर सोचती हूँ सब खोकर, होश आ भी गया तो क्या?

था अजब हादसा कि अपनों के चेहरे बेनक़ाब हो गए,
वो वहम ही बेहतर था मेरा, अब राज़ खुल भी गया तो क्या?
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एक महीने पहले

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