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ख़ामोशी बेहतर है

Shreyasi Satish

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दर्द जब हद से बढ़ता है तब आँसू कोई पी नहीं पाता है
        
                                                    
                            
फिर हाल-ए- दिल बगैर बताए रह नहीं पाता है

जबकि टूटा हो दिल अपनों से तो ख़ामोशी बेहतर है
ये अलग बात कि ज़ख्म नासूर बन जाता है
एक वर्ष पहले
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