विज्ञापन

पुनः पथ पर राही

Shreyansh Dwivedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पुनः पथ पर राही
        
                                                    
                            

चल दिया पुनः पथ पर राही।
समरांगण में आसीन हुआ बिन घोड़ों के रथ पर राही।

विश्राम व्यस्त है चलने में,
आरंभ अंत में ढलने में,
है नींद जागरण करने में,
प्रत्यंचा तीर उगलने में,
जल का बहाव विपरीत रहे, बढ़ रहा अनवरत पर राही,
चल दिया पुनः पथ पर राही।

जलते लावों पर चलने को,
शूलों के पथ पर ढलने को,
जब आया वक्त संभलने को,
या विष की घूँट निगलने को,
पाया मैंने, है अचल अडिग शूलों के स्वागत पर राही,
चल दिया पुनः पथ पर राही।

विपदा के हर आयोजन में,
निष्क्रियता के संयोजन में,
चहुँओर प्रकटती रोदन में,
अथवा वंचित आमोदन में,
हर व्यवधानों के ही समक्ष अब बैठ गया हठ पर राही,
चल दिया पुनः पथ पर राही।

विघ्नों को आमंत्रित करने,
शूलों को अभिमंत्रित करने,
खुद विष को मधु वर्षित करने,
खुद को पथ पर अर्पित करने,
अपना समस्त अस्तित्व समर्पित करने को तत्पर राही,
चल दिया पुनः पथ पर राही।
— श्रेयांश द्विवेदी
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Pradeep Kairana

2 कविताएं

View Profile

manoj tandon

22 कविताएं

View Profile