पुनः पथ पर राही
चल दिया पुनः पथ पर राही।
समरांगण में आसीन हुआ बिन घोड़ों के रथ पर राही।
विश्राम व्यस्त है चलने में,
आरंभ अंत में ढलने में,
है नींद जागरण करने में,
प्रत्यंचा तीर उगलने में,
जल का बहाव विपरीत रहे, बढ़ रहा अनवरत पर राही,
चल दिया पुनः पथ पर राही।
जलते लावों पर चलने को,
शूलों के पथ पर ढलने को,
जब आया वक्त संभलने को,
या विष की घूँट निगलने को,
पाया मैंने, है अचल अडिग शूलों के स्वागत पर राही,
चल दिया पुनः पथ पर राही।
विपदा के हर आयोजन में,
निष्क्रियता के संयोजन में,
चहुँओर प्रकटती रोदन में,
अथवा वंचित आमोदन में,
हर व्यवधानों के ही समक्ष अब बैठ गया हठ पर राही,
चल दिया पुनः पथ पर राही।
विघ्नों को आमंत्रित करने,
शूलों को अभिमंत्रित करने,
खुद विष को मधु वर्षित करने,
खुद को पथ पर अर्पित करने,
अपना समस्त अस्तित्व समर्पित करने को तत्पर राही,
चल दिया पुनः पथ पर राही।
— श्रेयांश द्विवेदी
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