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मूक स्वर

Shreyansh Dwivedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर तरफ हैं शून्य मंजर, भाव की भंगिमा विचलित,
        
                                                    
                            
मन्द चलती समीरों पर ताप का प्राबल्य विकसित,
हर वसंती वृक्ष पीले,
शुष्क हैं मौसम रँगीले,
छटपटाती चाह चंचल, चित्त चिंतित रिक्तियों से।
क्यों नहीं हैं फूटते स्वर इन विषय-आसक्तियों से?

टूटते हैं छन्द-मुक्तक, राग का आलाप धीमा,
शुष्क कंठों से फिसलकर टूटता विन्यास सीमा,
कवि मचलता लिख रहा स्वर,
प्रणय का आह्वान भरकर,
पर कलम की रोशनाई रिक्त है अनुरक्तियों से।
क्यों नहीं हैं फूटते स्वर इन विषय-आसक्तियों से?
पर लिखेगा हृदय में भर स्नेह की वह रोशनाई,
चेतना की शृंखला पर भरेगा रंगीन स्याही,
व्यक्त हो वह राग सूनी,
लेखनी हो तीव्र दूनी,
काव्य का आकाश गूंजे अब सुभाषित सूक्तियों से।
क्यों नहीं हैं फूटते स्वर इन विषय-आसक्तियों से?
– श्रेयांश द्विवेदी
एक दिन पहले
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