आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मूक स्वर

                
                                                         
                            हर तरफ हैं शून्य मंजर, भाव की भंगिमा विचलित,
                                                                 
                            
मन्द चलती समीरों पर ताप का प्राबल्य विकसित,
हर वसंती वृक्ष पीले,
शुष्क हैं मौसम रँगीले,
छटपटाती चाह चंचल, चित्त चिंतित रिक्तियों से।
क्यों नहीं हैं फूटते स्वर इन विषय-आसक्तियों से?

टूटते हैं छन्द-मुक्तक, राग का आलाप धीमा,
शुष्क कंठों से फिसलकर टूटता विन्यास सीमा,
कवि मचलता लिख रहा स्वर,
प्रणय का आह्वान भरकर,
पर कलम की रोशनाई रिक्त है अनुरक्तियों से।
क्यों नहीं हैं फूटते स्वर इन विषय-आसक्तियों से?
पर लिखेगा हृदय में भर स्नेह की वह रोशनाई,
चेतना की शृंखला पर भरेगा रंगीन स्याही,
व्यक्त हो वह राग सूनी,
लेखनी हो तीव्र दूनी,
काव्य का आकाश गूंजे अब सुभाषित सूक्तियों से।
क्यों नहीं हैं फूटते स्वर इन विषय-आसक्तियों से?
– श्रेयांश द्विवेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
23 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर