कृष्ण की मुरली जब बजती, नाम राधा का आता है,
श्याम के हर एक रोम में, श्रीजी का प्रेम समाता है।
वृंदावन की रज भी जैसे, चरणों में शीश झुकाती है,
राधा नाम की मधुर धुन, हर धड़कन में बस जाती है।
वो बरसाने की रानी हैं, वो श्याम की आराध्या हैं,
प्रेम की पावन परिभाषा, भक्ति की अनुपम साध्या हैं।
कृष्ण जिन्हें पाने को तरसें, ऐसी प्रेम की मूरत हैं,
श्री राधा के चरणों में ही, श्याम की सारी सूरत है।
मोर मुकुट हो या मुरली, सब राधा को प्यारे हैं,
श्याम कहें जिनको श्रीजी, वो जग से सबसे न्यारे हैं।
कृष्ण अगर हैं प्रेम अनंत, राधा उसकी गहराई हैं,
श्याम अगर हैं साँस हमारी, राधा उसकी परछाईं हैं।
यमुना की हर लहर कहती, राधे-राधे नाम सुनाओ,
कदंबों की छाँव पुकारे, श्रीजी को मन में बसाओ।
जिस मन में राधा बस जाएँ, वहाँ श्याम स्वयं आ जाते हैं,
सूने मन के आँगन में फिर, प्रेम के दीप जलाते हैं।
राधा केवल नाम नहीं हैं, कृष्ण की पहचान हैं,
उनके बिना अधूरी लगती, श्याम की हर मुस्कान है।
राधा में जो कृष्ण मिले हैं, कृष्ण में राधा समाई हैं,
दो तन नहीं, एक प्रेम हैं-यही प्रेम की सच्चाई है।
हे श्रीजी! इतनी कृपा करना, चरणों में मन लग जाए,
श्याम का नाम जपते-जपते, राधा नाम भी आ जाए।
न धन माँगूँ, न सुख माँगूँ, बस इतना उपकार रहे,
मेरे मन के वृंदावन में, राधे-श्याम का प्यार रहे।