विज्ञापन

जब कान्हा मेरे मन में आए

Shreya Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सूना था मन का आँगन, कोई राग सुनाई न था,
        
                                                    
                            
भीड़ बहुत थी चारों ओर, पर अपना कोई दिखाई न था।
फिर जाने किस पल कान्हा ने, मुरली की धुन छेड़ी,
सूखी पलकों पर जैसे फिर, सावन की बूँदें ठहरीं।

माथे पर मोर मुकुट सजा, अधरों पर मुस्कान लिए,
नंदलाला यूँ आए जैसे, सारे ग़म पहचान लिए।
मैंने पूछा-क्यों देर लगी? बोले-मैं तो पास खड़ा था,
तू दुनिया में ढूँढ़ रहा था, मैं तेरे ही साँसों में पड़ा था।

टूटी नाव थी जीवन की, कोई किनारा मिलता न था,
हर रिश्ता अपने मतलब का, कोई हमारा लगता न था।
कान्हा ने बस हाथ पकड़कर, इतना मुझसे कह डाला-
जिसका कोई नहीं जगत में, उसका मैं हूँ रखवाला।

अब हर दुख में धुन सुनती हूँ, हर आँसू में श्याम दिखे,
काँटों वाली राह मिले तो, उन राहों में धाम दिखे।
माखन चुराने वाले ने जब, मेरा मन ही चुरा लिया,
जन्माष्टमी की उस रात मैंने, अपना कान्हा पा लिया।

न दीप चाहिए, न फूल चाहिए, न कोई उपहार चाहिए,
मेरे कान्हा बस साथ रहो, इतना-सा संसार चाहिए।
जब तक साँस रहे तन में, नाम तुम्हारा गाती रहूँ,
तुम मुरली बनकर बजते रहना, मैं राधा बन मुस्काती रहूँ।
2 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Pandey

417 कविताएं

View Profile