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कुछ दरिंदे हैं

Shreedhar Editors,

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ दरिंदे हैं
        
                                                    
                            
जिन्हें जन साधारण का उत्थान
पच नहीं पाता है
किसानों की खेती लहलहाए
फसल बाजार में उम्दा बिक जाए
गाँव-घरों में खुशहाली हो,
बिजली पानी स्वास्थ्य सुविधा मिल जाए
उद्योग धंधे बढ़ें
कामगारों को काम मिले,
जरूरतमंदों को रोजगार मिले,
जन-जन की गृहस्थी चले
घर बने, गहने बनें, गाड़ी जुड़े;
आम जन को भी भविष्य की योजनाएं आऐं
टर्म इंश्योंरेस, हेल्थ इंश्योंरेस करे
मुचुअल फंड एसआइपी एवेरेजिंग का पता हो,
सामान्य मानवी के जीवन में
सुकून आए
वह भी रईशों वाला इंसानी जीवन जी सके
और सरकारें टैक्स पाएं
बदले में मूलभूत सुविधाओं का विकास हो।
-
कुछ दरिंदे हैं,
जिन्हें पच नहीं पाता,
स्थाई सरकारें हों
सही समय पर नीतियों का
दूरदर्शी निर्धारण हो,
जनता की आवाज सुने सरकार,
जनता से सहयोग पाए सरकार,
हिंदुस्तान का गौरव बढ़ता रहे
दुनिया में हमारी इज्जत बढ़ती रहे,
जीडीपी साल-दर-साल बढ़ती रहे,
पृथ्वी के मानचित्र में,
भारत ध्रुव तारे-सा जगमगाता रहे।
-
कुछ दरिंदे हैं,
जो इंसान की शक्ल में
लकड़बघ्घे हैं, भेड़िए हैं, लोमड़ हैं
प्रवृति में निहायत खूँरेज़ हैं
कीड़े-मकोड़े जहरीले सरीसृप हैं,
उन्हें अपनी तोंद से मतलब है,
उन्हें अपनी गंदी हरकतों में मस्ती है
उन्हें परवाह नहीं
उनके उत्पात के घनौने पाप से
मुल्क को कितनी चोट पहुँचती है,
आम जनता की रोजी-रोटी उन्नति रुकती है
पल-पल अग्रसर देश की उन्नति रुकती है।
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कुछ दरिंदे हैं
जिन्हें जन सामान्य देख रहा है,
देश उनकी सूची बना रहा है,
समय का चक्र जिन्हें परख रहा है
सही वक्त पर माकूल जवाब भी
यही जनतंत्र देगा उन दरिंदों को,
वक्त स्वयं विनाश करेगा दरिंदों का,
यह पावन धरती बोझ नहीं सहती,
इंसानी सूरत में आदमखोर दरिंदों का।
 
एक घंटा पहले
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