ख़याल उनका, कुछ इस तरह आता है जिगर में
अलग-सी ख़ुशबू जुदा-सी कद्र होती है जिगर में।
उनकी अगर-मगर में जाने, कितने दौर बीते और,
चाँद दरीचे से न उतरा, ताउम्र इंतज़ार जिगर में।
तमाम चादरें ओढ़ के, सो तो लेता मैं भी मगर,
कैसे बंद हो, उनकी यह आवा-जाही जिगर में।
गंगोत्री से गंगासागर, अनगिनत तीरध नहा लिए,
नहीं धुलता नाम उनका, जो शाया है जिगर में।
वो न करें इकबाल-ए-शिद्दत, मनमर्जियाँ उनकी,
कुछ न कुछ चुलबुली तो है, उनके भी जिगर में।
उनका रूठना, ख़ुद ही मुस्काना कैसी पहेली है,
ज़फ़ा-दर-ज़फ़ा देखी, मगर पाक़ीज़गी जिगर में।
आम रास्ते बंद कर दिए उसने मेरे ख़िलाफ़ 'मंज़र' ,
कहा, पोशीदा गली से आया-जाया करो जिगर में।