आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ख़याल उनका, कुछ इस तरह आता है जिगर में

                
                                                         
                            ख़याल उनका, कुछ इस तरह आता है जिगर में
                                                                 
                            
अलग-सी ख़ुशबू जुदा-सी कद्र होती है जिगर में।

उनकी अगर-मगर में जाने, कितने दौर बीते और,
चाँद दरीचे से न उतरा, ताउम्र इंतज़ार जिगर में।

तमाम चादरें ओढ़ के, सो तो लेता मैं भी मगर,
कैसे बंद हो, उनकी यह आवा-जाही जिगर में।

गंगोत्री से गंगासागर, अनगिनत तीरध नहा लिए,
नहीं धुलता नाम उनका, जो शाया है जिगर में।

वो न करें इकबाल-ए-शिद्दत, मनमर्जियाँ उनकी,
कुछ न कुछ चुलबुली तो है, उनके भी जिगर में।

उनका रूठना, ख़ुद ही मुस्काना कैसी पहेली है,
ज़फ़ा-दर-ज़फ़ा देखी, मगर पाक़ीज़गी जिगर में।

आम रास्ते बंद कर दिए उसने मेरे ख़िलाफ़ 'मंज़र' ,
कहा, पोशीदा गली से आया-जाया करो जिगर में।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर