एक कविता वीर जवानों पर
नभ में जल में नग पर खेल रहे जो खून की होली दुश्मन को मार भगाकर खाते हैं सीने पर गोली
घर द्वार छोडके डटकर सरहद पे पहरेदारी जो करते।
लिए तिरंगा हाथ में लड़ते और वन्देमातरम कहते।
नमन कर रहा हूँ मैं दिल से ऐसे वीर जवानों को।
जिनकी गाथाएं मैं गाउँ पढ़कर के बलिदानों को।
आभाओं की लट से जिनके कण कण भी वंदन करते
लिए तिरंगा हाथ मे लड़ते और वन्देमातरम कहते।
दुआ है जिन पर मात-पिता की घरवाली का है प्यार। राखी में रखकर है भेजी बहना खुशियों का संसार।
बेटा जिनका अब पूछ रहा है मां पापा कहां है रहते।
लिए तिरंगा हाथ मे लड़ते और वन्देमातरम कहते ।
हिन्द में बहतीं सारी नदियां शौर्य है जिनका गातीं।
हिमगिरि से द्रविण,बंग तक सबके मन को हैं भातीं।
लद्दाख से लेकर सियाचीन भी प्रणाम है उनको करते।
लिए तिरंगा हाथ मे लड़ते और वन्देमातरम कहते।
शिवसागर सहर
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