अब द्रवित हो उठा है मेरा मन
हैं दूर साहित्य से यहां के जन
विश्व पटल में फैले तम को
इसे कैसे दूर करेंगे हम
विहग बावली सी बगिया में
अब कैसे नूर भरेंगे हम
हे ज्ञान स्वरूपा!फैला दो तुम
जग में अपनी ज्ञान किरन
कर रहे संकलित मन से हम तो
हर वक्त तुम्हारा ही सुमिरन
सब मिट जाए घन के छाये
सित प्रकाश अब जग में आये
मां वीणा से स्वझंकृत करके
विद्या को हर घर मे पहुंचाये
और दीप्त हो जाए हर रज कण
अब द्रवित हो उठा है मेरा मन
हैं दूर साहित्य से यहां के जन
~शिवसागर"सहर
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