तन्हाई में रफ्ता रफ्ता बिखर रहें हैं कितने लोग
यादों के उबले पानी मेंपिघल रहे हैं कितने लोग
मन के बीहड़ जंगल में लिए हुए हैं घात शिकारी
घायल किसी परिंदे जैसे घिसट रहे हैं कितने लोग
जरा ठहर कर सुन ले कोई दर्दे दिल का अफसाना
खुद को खुद का दर्द सुनाके सुलग रहे हैं कितने लोग
इश्क नहीं होता है बुत से उसमें तो जज़्बात कहाँ
दीवारों से सर टकराकर सिसक रहे हैं कितने लोग
दास हमारी बस्ती में क्या कोई भी इंसान नहीं है
अपनी जां लेकर हाथों में निकल रहे हैं कितने लोग..