जड़ काटकर जमीं से जुड़ने को कह रहे हैं
पर काटकर हमीं से उड़ने को कह रहे हैं
आपकी इबादत के अंदाज निराले हैं जरा
दोपहर में सूरज से ढलने को कह रहे हैं
हमें इल्म क्या था ज़माने की आजमाइश का
पानी भरे चराग को जलने को कह रहे हैं
कौन अपना दुनियां में और है पराया कौन
यूं खुद ही अपने आप को छलने को कह रहे हैं
ये शकल ये अकल ना कुछ भी काम आएगी
कुदरती निज़ाम जो बदलने को कह रहे हैं
ये दास ज़माने के सितम किस रंग में ढल गए
है क़त्ल का फरमान और हँसने को कह रहे हैं!!