कहे पद्मिनी वीरों की
तलवार न सोने पाए
फिर अबला नारी पर
अत्याचार न होने पाए
हर नारी में छवि है मेरी
देखो और पहचानो
हर चौराहे पर खिलजी है
मानो या ना मानो
देखो फिर से मानवता
की हार न होने पाए
फिर अबला नारी पर
अत्याचार न होने पाए*
चमक उठी है जो तलवारें
मेरी अमिट कहानी पर
क्यो खामोश हुई सहती है
दुष्टों की मनमाानी पर
अपने आँगन की बेटी
लाचार न होने पाए
फिर अबला नारी पर
अत्याचार न होने पाए
खिलजी तो बाहर से आया
हिंसक पशु अभिमानी
अपने घर के दानव से
है घायल राजपुतानी
फिर आँखो से अश्को की
बौछार न होने पाए
फिर अबला नारी पर
अत्याचार न होने पाए
- डॉ.शिवानी सिंह राजपूत
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