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मेरी नहीं, हमारी नदियाँ

Shivangi Verma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह मेरी नदियाँ हैं,
        
                                                    
                            
इनसे जुड़ा है मेरा बचपन,
जिनके किनारों पर किलकारियाँ मारते हुए मैंने बिताया है हर एक पल,
जो साफ़ इतनी, जैसे एक दर्पण।

लेकिन आज इन नदियों में बहता अमूल्य धन,
इन कंक्रीट के जंगलों से तबाह हो रहा है,
वह इंसान, जिसने बनाए ऊँचे-ऊँचे भवन,
क्यों इतना बड़ा गुनाह कर रहा है?

कचरा जाता है उन नदियों में,
अश्रु मेरी धरती माँ के बहते हैं,
ग़लत इंसान कर रहा है सदियों से,
लेकिन उसका कष्ट सारे जीव-जंतु सहते हैं।


देखो देखो मछलियाँ तड़प रही हैं,
देखो कैसे चारों ओर फ़सलें सड़ रही हैं,
देखो देखो बीमारियाँ फैल रही हैं,
देखो मेरी धरती माँ रो रही है।


लेकिन यह सब मेरा नहीं, हमारा है!

इनकी सुरक्षा हमारा अधिकार नहीं,
हमारी ज़िम्मेदारी है।
यह धरती माँ से मिला अमूल्य उपहार नहीं,
उनका उपकार है।
और हम इसकी सुरक्षा करें,
यही सबसे बड़ी समझदारी है।

तो आओ हम मिलकर,
हमारी नदियों को,
हमारी मछलियों को,
हमारी फ़सलों को,
खुद को,
एक नया मौका देते हैं।
बहने का। तैरने का। उगने का। खिलने का।
आओ हम हमारी धरती माँ को वह साफ़ नदियाँ लौटा देते हैं।
एक महीने पहले
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