हाँ, मैं अवारा हूँ, जो लोगों से उलझता हूँ,
झूठी रवायतों के आगे कभी नहीं झुकता हूँ।
महफ़िल में बैठकर भी तन्हा-सा दिखता हूँ,
जो दिल में होता है, वही बेबाक लिखता हूँ।
मेरी ख़ता बस इतनी—मैं सच का गवाह हूँ,
झूठे किरदारों की दुनिया में बेपनाह का आवाज़ हूँ |
वफ़ा की तलाश में दर-दर भटकता रहा,
अब अपने ही ज़मीर की आवाज़ की पनाह हूँ।
कभी नफ़रत मिली, कभी इल्ज़ाम मिला,
कभी अपनों से भी अजीब-सा पैग़ाम मिला।
मैंने सज्दे किए मोहब्बत के नाम पर,
मगर हर मोड़ पर मुझे ही इंतक़ाम मिला।
लोग कहते हैं—तू इतना ख़ामोश क्यों है?
मैं कहता हूँ—हर ज़ख़्म का फ़साना नहीं है।
मेरी ख़ामोशी को कमज़ोरी मत समझना,
हर शख़्स को अपनी रूह का अफ़साना नहीं है।
मैं बाग़ी हूँ, मगर बेवजह बग़ावत नहीं करता,
ज़ुल्म देखूँ तो ख़ामोश इबादत नहीं करता।
सच अगर कड़वा है तो कड़वा ही कहूँगा,
मैं झूठ के दरबार में हुकूमत नहीं करता।
मुझे दौलत नहीं, बस थोड़ा-सा सुकून चाहिए,
झूठी वाहवाही नहीं, सच्चा जुनून चाहिए।
जो मेरा है, वो मेरे साथ रहे उम्रभर,
बाक़ी इस फ़ानी दुनिया से क्या मुझको चाहिए।
मैं ज़िद्दी हूँ, मगर ज़ुल्म का हामी नहीं,
मैं ख़ुद्दार हूँ, किसी ताज का दावेदार नहीं।
जो बात गले न उतरे, उसे मानता नहीं,
मैं बिक जाऊँ इतना भी बेकार इंसान नहीं।
**ना ताज चाहिए, ना दौलत का नशा चाहिए,
बस सच के सफ़र में थोड़ा-सा रास्ता चाहिए।
जो मेरे साथ है, उसका एहतराम दिल में है,
जो ख़िलाफ़ है—उसे भी ख़ुदा का सलाम चाहिए।**