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आवारा हूं

Shivam Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आवारा हूं !!!............
        
                                                    
                            

बांध कहीं खुद को ना रख पाता हूं,
नित अपने नियम बनाता हूं ।
ख्वाहिश की पहाड़ तोड़ने को,
नित नए हथियार उठता हूं ।
यूं अपनों के इच्छा को पूरा ना कर पाता हूं।।
आवारा हूं !!........

मा को चाहिए अब दुल्हनिया,
पापा अब चाहते बांटना जिम्मेदारियां ।
मैं तब तक नौकरी की बैसाखी ही छोड़ आता हूं,
अपने जन्मदाता के सपनों को तोड़ आता हूं ।
बोल नहीं पाते खुल कर,
रह जाते हैं घुल घुल कर ।
मै सब समझ कर भी,
इच्छा पूरी ना कर पाता हूं।।
आवारा हूं !!.......

उनका है एक प्यारा सपना,
जिसपे लूटा दिया उन्होंने जीवन अपना ।
बेटा हो सरकार में नौकर,
पास में हो बीवी बच्चे , गाड़ी और नौकर चाकर।।
पर इतर इससे मैंने सोंचा था,
सरकारी नौकरी की ओर टेढ़े मुंह भी ना  देखा था ।
उनके बलिदानों का,  अद्भुत उपहार लौटना चाहता हूं ।।
सच में जरूरत पर घर को आना चाहता हूं,
इन सब की खातिर नित नए सरंजाम जुटाता हूं ।।
खुद सब समझ कर भी,
किसी को समझा ना पाता हूं।।।
आवारा हूं………।।।।।।

अभी जवानी है मेरी,
शौक नहीं कुछ आडी टेढ़ी।
छोड़ छोटी खुशियां,
खुद को अंगारों को झोंक डाला है।।
बस nasha-e- दौलत और शोहरत मैंने पाला है,
यही मेरी दवा है, यही मेरी हाला है ।।
क्या करूं???
संतोषी स्वभाव ना अपना पाता हूं,
पाने को अपनी चाहत,
लिकों से हट राह बनाता हूं ।
मातृभूमि की खातिर, माता  को दुख पहुंचता हूं।।
कल निश्चिंत हो सोने को,
आज कितनी रात जग जाता हूं।

आवारा हूं…….!!!!!!

हां मै आवारा हूं ………..!!!!!!!





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