कुछ ख़ास ही थे तुम
अलहदा एहसास थे तुम
हर ख़्याल बस तुम्हारा
दिल के कुछ पास थे तुम
अँधेरों को तलाश थी जिसकी
थे तुम वो खोया सा उजाला
बेचैनी के आलम में घबराते
मेरे जी को तुमने ही संभाला
गुरु, दरवेश न जाने क्या क्या
सब कुछ तुम्हें मानने को चाहा
तुम्हारे उपदेशों ने कभी न उबाया
बड़ी गहरी लगती थीं बातें तुम्हारी
उन्हीं बातों ने मुझको लुभाया
जब पाया कि तुम पर भरोसा बढ़ता गया
और ख़ुद का ख़ुद पर यक़ीन खोता गया
ग़ौर किया, बहुत सोचा, सोचता ही गया
तो पाया कोई ख़ास काम नहीं तुम्हारा
सिवाए वक़्त-बेवक़्त ग़लत मुझे करार देने के
कि वजूद मेरा बस इतना रहा
तेरी परछाई ही बनकर रह गया
परत दर परत तुम खुलते गए
कुछ राज़ और फ़ाश होते गए
तुम्हें ज्ञान था,बारीक़ सा भान था
उससे भी ज़्यादा अभिमान था
बातें तुम्हारी बड़ी मनमोहक
शुरू में जो लगें उत्साहवर्धक
आकर्षण तुम्हारी वाणी का
जैसे आकाश से आया प्रवर्तक
बस यही छलावा हो गया
कर्म गौण, वचन प्रधान हो गया
स्वघोषित सिद्धों से भरा पड़ा संसार है
लगता जहाँ मोह माया का दरबार है
ये तो हम जैसों को है शुक्रिया
वरना तामझाम तुम्हारा सब बेकार है
जब जब ख़ुद पर से यक़ीन खोया जाएगा
तुम जैसे बड़बोलों को ही गढ़ा जाएगा
चमत्कारों को ही नमस्कार करते रह जाएंगे
अस्तित्व हमारा यूँ ही मिटाया जाएगा
-शिवम खरे