बिगुल बज गये शंख बजा दो,
अब रण गर्जन होने दो ।
नेहरू की उस गलती पर
अबकी मर्दन होने दो ।।
सिंदूर का बदला इतना गहरा,
कायर समझ न पाया था ।
अब तो फंसा है बीच भंवर में,
पहलगाम क्यों आया था ।।
पहले विचार किया होता,
तो यह नौबत क्यों होती ।
भारत की सेना निज शौर्य का,
ऐसा परिचय क्यों देती ।।
गलती तुमने की है,
POK हमारा होगा ।
अब समझौता करोगे तुम,
रावलपिंडी का नज़ारा होगा।।
- शिवगोपाल पयासी 'सरस'