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"हिंदी को एक दिन मत पहनना"

SHITAL RAJ

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            "हिंदी को एक दिन मत पहनना"
        
                                                    
                            

हिंदी को
एक दिन मत पहनना—
जैसे पहने जाते हैं
त्योहारों के नए कपड़े;
मंच पर सजा लेना,
फूल चढ़ा देना,
दो शब्द कह देना
और फिर
उतारकर रख देना
अगले वर्ष के लिए।

हिंदी
कोई पोशाक नहीं है।

वह तो पहला स्पर्श है
जिसमें माँ की उँगली पकड़कर
हमने दुनिया को जाना था।

वह पहला संबोधन है—
“बेटा!”

एक छोटा-सा शब्द,
और उसके भीतर
पूरा घर।

पिता ने जब कहा था—
“ध्यान रखना।”
शब्द केवल दो थे,
लेकिन उनके पीछे
एक पूरी उम्र
हमारी सलामती की दुआ बनकर
खड़ी थी।

शायद यही हिंदी है—
जो शब्दों से पहले
भाव बनकर आती है,
जो आवाज़ से पहले
आँखों में उतरती है,
और जिसे समझने के लिए
किसी शब्दकोश की
ज़रूरत नहीं पड़ती।

यह किसी किसान के माथे पर
ठहरी हुई धूप है,
किसी माँ के आँचल में
बची हुई गर्माहट,
किसी पिता की हथेली पर
जमी हुई मेहनत,
और किसी बच्चे की कॉपी में
पहली टेढ़ी-मेढ़ी पंक्ति।

यह केवल
अक्षरों का संसार नहीं—
यह उन अनगिनत जीवनों की
मौखिक स्मृति है,
जिन्होंने इतिहास में
नाम दर्ज नहीं कराया,
पर इस देश को
जीना सिखाया।

इसलिए प्रश्न यह नहीं
कि हिंदी कितनी महान है।

प्रश्न यह है—
हम हिंदी के साथ
कितने सच्चे हैं?

घर में जिसे
हम सबसे पहले बोलते हैं,
क्या उसी भाषा में
सपने देखने में
हमें कोई संकोच है?

दुनिया की भाषाएँ सीखिए—
जितनी सीख सकें, सीखिए;
ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती।

पर इतना याद रखिए—
खिड़कियाँ कितनी भी हों,
घर एक ही होता है।

भाषाएँ प्रतिद्वंद्वी नहीं,
मनुष्य के भीतर खुलती
अलग-अलग दिशाएँ हैं।

और अपनी भाषा से प्रेम
किसी दूसरी भाषा से
घृणा करना नहीं है।

यह तो बस इतना है
कि जब दुनिया के शोर में
हम अपने ही शब्द भूलने लगें,
तब कोई भीतर से पुकारे—
और हम पहचान लें
कि यह आवाज़
हमारी अपनी है।

क्योंकि
जड़ों का कोई अनुवाद नहीं होता।

उन्हें केवल
महसूस किया जाता है।

इसलिए
हिंदी दिवस पर
हिंदी को एक दिन मत पहनना।

उसे अपने व्यवहार में रखना,
अपनी बातचीत में रखना,
अपनी संवेदना में रखना,
और सबसे बढ़कर—
अपने आत्मसम्मान में रखना।

और यदि कभी
मेरी कलम से ऐसा कोई शब्द निकल आए
जिसमें मेरी मिट्टी की गंध हो,

किसी पंक्ति में
माँ की आवाज़ सुनाई दे,

किसी विराम में
पिता की चुप्पी बोल उठे,

और किसी पाठक को
मेरे शब्दों में
अपने घर की आहट मिल जाए—

तो मैं यह दावा नहीं करूँगा
कि मैंने हिंदी के लिए
कुछ लिखा है।

मैं बस मुस्कुराकर कहूँगा—

मैंने अपनी भाषा में
अपने हिस्से की स्मृति बचाई है;
और स्मृति बची रहे,
तो मनुष्य
पूरी तरह अकेला नहीं होता।
— शीतल राज ‘किशोर’
एक महीने पहले
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