"अर्घ्य में पूरा बिहार"
साँझ नदी में सूरज उतरा,
जल ने आँचल तान लिया,
माटी ने जब माथा झुकाया,
आकाश ने सम्मान किया।
सूप उठे तो साथ उठी है
पीढ़ी-पहचान बिहार की,
एक अर्घ्य में समा गई है
पूरी धरती प्यार की।
ईख खड़ी जैसे खेतों की
हरी-हरी उम्मीद हो,
ठेकुआ में जैसे माँ के हाथों
की छुपी हुई ईद हो।
गुड़ की गंध लिए आँगन में
बचपन फिर मुस्काता है,
दउरा सिर पर रखकर कोई
घर का इतिहास उठाता है।
सूप उठे तो साथ उठी है
पीढ़ी-पहचान बिहार की,
एक अर्घ्य में समा गई है
पूरी धरती प्यार की।
घाट नहीं बस घाट यहाँ है,
यह तो खुला विधान है,
मिट्टी जिसके पाँव पखारे,
जल जिसका सम्मान है।
कोई साथ लिए दीपक आया,
कोई लेकर गीत,
कोई श्रम से राह सजाए,
कोई लेकर प्रीत।
जिसके पास न दउरा था, वह
घाट सजाने आया,
जिसके पास न शब्द थे, उसने
दीप जलाकर गाया।
यही तो अपनी माटी का
सबसे सुंदर व्यवहार है—
जिसके हिस्से जो आया,
उससे सबका त्योहार है।
मगही की मीठी तान मिली जब,
मैथिल स्वर मुस्काया,
भोजपुरी ने बाँह पकड़ ली,
अंगिका ने गाया।
बज्जिका की बोली घुलकर
बन गई एक पुकार—
बोल अलग हों, मन एक रहे,
यही कहता बिहार।
सूप उठे तो साथ उठी है
पीढ़ी-पहचान बिहार की,
एक अर्घ्य में समा गई है
पूरी धरती प्यार की।
परदेस गया बेटा लौटा,
माँ ने द्वार बुहारा,
बरसों बाद उसी चौखट ने
फिर से नाम पुकारा।
ट्रेनें जैसे गाँव उतरतीं,
बसते फिर परिवार,
छठ बुलाता नहीं किसी को—
खींच लाता घर-द्वार।
जिस शहर में वर्षों गुजरे,
वह भी अपना था लेकिन,
माँ के हाथ का घाट मिले तो
घर मिलता है तब जाकर।
डूब रहे सूरज को देखो,
कैसा सुंदर ज्ञान है—
अंत नहीं है अस्ताचल भी,
कल फिर नया विहान है।
जो आज थका है, उसे प्रणाम,
जो कल फिर उठ पाएगा,
जीवन कभी समाप्त न होगा,
रूप बदलता जाएगा।
इसलिए तो छठ कहता है—
मत करना अभिमान,
डूब रहे को अर्घ्य चढ़ाओ,
उगते को दो सम्मान।
भोर हुई तो पूरब फूटा,
लाली जल में आई,
हाथ उठे तो लगा कि जैसे
धरती ने धूप उठाई।
जल में काँपा स्वर्णिम सूरज,
मन में दीप जला,
एक किरण के साथ अचानक
हर चेहरा उजला।
किसके घर का सूरज है यह?
पूछो मत, पहचान—
जिस घर में श्रम, प्रेम और आशा,
वहीं उगे भगवान।
छठी मैया, इतना देना—
माटी सूनी न हो,
किसी किसान की आँख कभी
बादल को रोती न हो।
नदियाँ अपनी साँस बचाएँ,
पोखर गीत सुनाएँ,
बच्चे अपनी मिट्टी से फिर
रिश्ते जोड़ पाएँ।
माँ के माथे की चिंता हर लो,
बेटी के सपने पालो,
जिस घर में रोटी कम हो, वहाँ
पहले दीपक डालो।
अर्घ्य हमारा केवल अपनी
खुशियों का अधिकार नहीं—
सुख वह सच्चा सुख है जिसमें
दूजे का भी भार नहीं।
आज घाट पर जब हाथ उठेंगे,
साथ उठे संसार,
सूरज से पहले याद करें हम—
माटी, नदी, किसान।
दउरा में फल ही फल नहीं हैं,
सदियों की स्मृतियाँ हैं,
सूप के भीतर केवल पूजा नहीं,
घर-घर की कृतियाँ हैं।
साँझ नदी में सूरज उतरा,
जल ने आँचल तान लिया,
माटी ने जब माथा झुकाया,
आकाश ने सम्मान किया।
सूप उठे तो साथ उठी है
पीढ़ी-पहचान बिहार की,
एक अर्घ्य में समा गई है—
पूरी दुनिया प्यार की।
और जब पूछे कोई—
“छठ कहाँ है?”
कह देना—
जहाँ माँ तपती है,
जहाँ खेत महकता है,
जहाँ परदेस से बेटा लौटता है,
जहाँ डूबते को भी सम्मान मिलता है—
वहीं छठ है…
वहीं बिहार है!
-शीतल राज 'किशोर'