फ़ैसला जब तलक हो नहीं जाता,
तब तलक जीत हार दोनों मेरे हैं।
मैदान छोड़ भागने वालों में नहीं हूँ मैं,
हर संघर्ष के मंज़र मेरे हैं।
माना कि अंधेरा गहरा है और राहें धुंधली सी दिखती हैं,
पर भोर की पहली किरण के इंतज़ार में,
ये जागते हुए नयन मेरे हैं।
कोशिशों का सिलसिला थमेगा नहीं,
जब तक सांसों का आना-जाना है,
मंजिल मिले या न मिले इस सफर में,
ये खूबसूरत तजुर्बे सब मेरे हैं।"
-शैलेंद्र शुक्ला" हलदौना "