तेरे जाने के बाद
यह शहर वीरान , वीरान सा क्यों लगता है ,
काम है बहुत आसान
पर आसान , आसान क्यों नहीं लगता है ,
बैठा रहता हु दिन भर घर में
पर आराम , आराम सा क्यों नहीं लगता है ।
मेरे घर से , तेरे घर की दहलीज , है
....चार कदम की दूरी पर
पर वहां जाना अब क्यों
आसान सा नहीं लगता है ,
मेरे घर में भी रहते हैं मेरे सब लोग ,
पर तेरे एक ना होने से....
हर कोई अनजान सा क्यों लगता है ।।
मारा , मारा फिरता रहता हूं ...
दिन दोपहरी तेरी ही याद में
इन त्योहारों के मौसम में भी ,
यह शहर मुझे कब्रिस्तान सा क्यों लगता है !