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यह शहर मुझे कब्रिस्तान सा क्यों लगता है !

                
                                                         
                            तेरे जाने के बाद
                                                                 
                            
यह शहर वीरान , वीरान सा क्यों लगता है ,

काम है बहुत आसान
पर आसान , आसान क्यों नहीं लगता है ,

बैठा रहता हु दिन भर घर में
पर आराम , आराम सा क्यों नहीं लगता है ।

मेरे घर से , तेरे घर की दहलीज , है
....चार कदम की दूरी पर
पर वहां जाना अब क्यों
आसान सा नहीं लगता है ,

मेरे घर में भी रहते हैं मेरे सब लोग ,
पर तेरे एक ना होने से....
हर कोई अनजान सा क्यों लगता है ।।

मारा , मारा फिरता रहता हूं ...
दिन दोपहरी तेरी ही याद में

इन त्योहारों के मौसम में भी ,
यह शहर मुझे कब्रिस्तान सा क्यों लगता है !

 
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3 घंटे पहले

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