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क्या करे जब शेष स्पंदन नहीं है

SHASHI BHUSHAN

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहाने हर बार यह कि मन नहीं है,
        
                                                    
                            
सच तो ये है कि अपनापन नहीं है,

हट गया पर्दा नज़र से देख ली जब,
मेरे मन में भी कोई उलझन नहीं है,

मदद करने की न हो गर चाह दिल से,
लोग कह देते हैं कि अब धन नहीं है,

पंख लगते ही परिंदा उड़ा नभ में,
तोड़ सब पाबंदियां बंधन नहीं है,

समझकर टीका लगाया जिसे सर पे,
फिर हुआ महसूस यह चन्दन नहीं है,

व्यक्तिगत आलोचना हरबार हो जब,
हाथ का जुड़ना तो अभिनंदन नहीं है,

नब्ज़ छू कर वैद्य भी खामोश 'गुंजन',
क्या करे जब शेष स्पंदन नहीं है,
--शशि भूषण मिश्र 'गुंजन'
3 घंटे पहले
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