उम्मीदों के बुझ गए, मेरे सभी चराग,
तम ने निगल लिए, जीवन के अनुराग।
जिन राहों पर कभी, स्वप्नों के फूल खिले,
उन राहों पर आज, बिखरे हुए हैं दाग।
जिन दीपों को आँधियों से, हथेली ने बचाया,
वे दीप ही बन गए अब, स्मृतियों के विराग।
नभ मौन हो गया, दिशाएँ हुईं उदास,
वीणा के तार टूटे, न शेष कोई राग।
किससे कहूँ व्यथा अब, किसको पुकार दूँ,
अधरों पर जम गया, पीड़ा का निःशब्द राग।
फिर भी हृदय-गुहा में, कुछ स्पंदन शेष है,
राख के आवरण में, पलता हुआ अंगार।
रातें भले अनंत-सी, लगती हों इस क्षण,
तम की ही कोख में, पलता नया प्रभात।
टूटे हुए चरागों ने, इतना बता दिया—
बाहर नहीं, स्वयं में, खोजो प्रकाश-द्वार।
उम्मीदें बुझ भी जाएँ, चेतन न बुझ सके,
एक श्वास शेष हो, फिर जन्म ले उजास।
- सनातन मुकुंद