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उलटी धारा, अनंत किनारा :प्रतीकात्मक–रहस्यवादी–उलटबांसी दार्शनिक गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कण में ब्रह्मांड सिमटा, नभ में कण मुस्काया,
        
                                                    
                            
शून्य ने आकार रचा, आकार शून्य में आया।

बीज अँधेरे में पलता, वन बन नभ तक छाया,
माटी ने आकाश पिया, नभ मिट्टी में समाया।

नदी सागर छोड़ चली, सागर ने अपनाया,
डूब गई तो स्वयं मिली, डूबने ने पार दिखाया।

सूरज जलकर प्राण लुटाए, अग्नि अमृत बरसाए,
चाँद घटे, मन बढ़ता जाए, घटकर ज्योति बढ़ाए।

परमाणु नाचे मौन में, तारक-लोक झनकाए,
सूक्ष्म कणों की धड़कन में, विराट् लोक समाए।

श्वास चली तो जीवन जागा, श्वास रुकी तो जाना,
मृत्यु बनी जीवन की देहरी, कौन सके पहचाना?

काल स्वयं को पीता जाए, फिर भी काल न खाए,
क्षण मरकर युग को जन्मे, कुदरत कौन बताए?

जिसको खोजे दूर जगत में, अंतर वही समाया,
खुद को खोकर जिसे मिला—वही अनंत पाया।
-सनातन मुकुंद
12 घंटे पहले
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