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तेरे रंग में रंगा मन : संगीतात्मक–भक्तिपरक गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तेरे रंग में रंगा मन मेरा, दूजा रंग न भाता है,
        
                                                    
                            
तेरे नाम की मधुर तान पर, अंतर वीणा गाता है।

तेरी छवि नयनों में बसती, तेरी धुन श्वासों में,
तेरा अमृत घुलता रहता, मेरे मौन अहसासों में।
तेरी कृपा की बूँद पड़ी, मरुस्थल फूल खिलाता है,
तेरे रंग में रंगा मन मेरा, दूजा रंग न भाता है।

तेरे चरणों में रख दी मैंने, जीवन की हर अभिलाषा,
तू ही मेरा दीपक-प्राण है, तू ही मेरी अंतिम आशा।
जग से जब भी मन ऊब जाए, तेरा द्वार बुलाता है,
तेरे रंग में रंगा मन मेरा, दूजा रंग न भाता है।

तू ही भीतर नाद अनाहत, तू ही जीवन-धारा है,
तेरी छाया में हर धड़कन, तेरा ही उजियारा है।
बिन बोले तू समझे सब, मन तुझको बतियाता है,
तेरे रंग में रंगा मन मेरा, दूजा रंग न भाता है।

मैं मिट जाऊँ तेरी धुन में, मेरा कुछ भी शेष न रहे,
तेरी इच्छा ही मेरी इच्छा, इससे बढ़कर क्या वर मिले।
बूँद समाकर सिंधु में जैसे, अपना नाम भुलाता है,
तेरे रंग में रंगा मन मेरा, दूजा रंग न भाता है।

तन तेरा है, प्राण तुम्हारे, तुझमें ही सब अर्पण है,
तेरी प्रेम-ज्योति में जलना, जीवन का अभिनंदन है।
तेरे होकर तुझको पाना, मन को परम सुखाता है,
तेरे रंग में रंगा मन मेरा, दूजा रंग न भाता है।
- सनातन मुकुंद
एक महीने पहले
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