साहित्य दीप जलाता है,
जीवन-पथ दिखलाता है।
मन का तम हर लेता है,
नई प्रभा ले आता है।
दुःख में धीरज, सुख में संयम,
जीने का ढंग सिखाता है।
प्रेम-दया-सत्य के स्वर से,
मन को निर्मल करता है।
साहित्य दीप जलाता है,
जीवन-पथ दिखलाता है।
संस्कृति की थाती सँजोकर,
पीढ़ी-पीढ़ी सौंपता है।
मौन अधरों को स्वर देकर,
सोई चेतन जगाता है।
साहित्य दीप जलाता है,
जीवन-पथ दिखलाता है।
शब्द नहीं, ये भाव-सरोवर,
मन की प्यास बुझाता है।
मन से मन को जोड़कर,
मानवता का मान बढ़ाता है।
साहित्य दीप जलाता है,
जीवन-पथ दिखलाता है।
शब्द रहें या मौन हो जाएँ,
भाव कभी मरते नहीं;
युग बीतें, इतिहास बदलें,
सत्य कभी मिटते नहीं।
जो अंतर में दीप जला दे,
जो जीवन को स्वर दे जाए;
मानवता की धड़कन बनकर,
साहित्य युग-युग गाता जाए।
-सनातन मुकुंद