राष्ट्र बने तप की अखण्ड प्रज्वलित मशाल,
त्याग बने जीवन का पुण्य-विशाल,
जहाँ निजत्व गलकर समष्टि में विलीन हो,
वहीं चेतना का हो दिव्य उज्ज्वल भाल।
भूमि में ऋषि-तपःपूत धरा की सुवास,
रज-कण में संस्कारों का अक्षय प्रकाश,
जहाँ कण-कण साधना-मंत्र बन जाए,
वहीं आत्मबोध का शाश्वत निवास।
जन में सहस्र हृदयों का एक स्पन्दन,
करुणा से दीप्त मानवता का नन्दन,
जहाँ ‘मैं’ मिटे, ‘हम’ का ब्रह्म फूट उठे,
वहीं प्रेम बने चेतना का चिर चन्दन।
संस्कृति में श्रुति-स्मृति का दिव्य विधान,
ऋषि-दृष्टि से दीप्त सनातन ज्ञान-गान,
युग बदलें, पर मूल चेतना न क्षीण हो,
वही आत्मा का अक्षय अमृत-प्राण।
-सनातन मुकुंद