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रहगुज़र : नज़्म

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़िंदगी की इस अजीब-सी रहगुज़र में,
        
                                                    
                            
ढूँढ़ते हैं हम ख़ुद को इसी सफ़र में।

कोई हमको मंज़िल का पता बताए कैसे,
खो गए हैं हम न जाने किस भँवर में।

छोड़ आया पीछे कुछ हसीं यादों के फूल,
अब कोई नहीं है इस दश्त-ए-सफ़र में।

थक गए पाँव मगर हौसला अब भी है बाक़ी,
चलना ही लिखा है शायद मेरे मुक़द्दर में।

कौन जाने कब हो फिर मुलाक़ात उससे,
आज भी ठहरा हूँ मैं उसी रहगुज़र में।

— श्री सनातन मुकुंद
2 महीने पहले
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