अंतर-कुंज में प्रेम-सुधा की, अविरल धारा राधा है,
श्याम-चेतना के नील गगन की, उज्ज्वल तारा राधा है।
मौन-मुरलिका के मधुर स्वरों में, जिसकी साँसें गाती हैं,
विरह-विह्वल नयनों में भी, मिलन-दीप जलाती हैं।
यमुना की श्यामल लहरों में, जिसकी छवि झिलमिल डोले,
कदंब-कुंज की मौन छाँह में, जिसकी पायल रुनझुन बोले।
जिसकी चरण-रज छूते ही, कण-कण चंदन बन जाता है,
राधा-नाम जपते ही मन, अपना वृंदावन पाता है।
जहाँ न माँग शेष रहती, केवल समर्पण होता है,
‘मैं’ का आवरण मिटते ही, श्याम-प्रेम का उदय होता है।
प्रेम-सुधा जब अंतस बरसे, मन स्वयं वृंदावन है,
राधा-भाव जहाँ जागे, श्याम वहीं स्पंदन है।
राधा देह नहीं, वह शाश्वत, प्रेम-तत्त्व की भाषा है,
श्याम-समर्पित चेतन की, निःशब्द अनंत अभिलाषा है।
जिस हृदय-कुंज में राधा जागे, द्वैत वहाँ टिक पाता क्या?
प्रेम स्वयं जब श्याम पुकारे, श्याम अलग रह पाता क्या?
अंतर में जब प्रेम-सलिल की, निर्मल गंगा बहती है,
राधा-भाव जगे जिस मन में, हर धड़कन रास कहती है।
- सनातन मुकुंद