नील-वसन धरती के तन पर, रजत-रेखा-सी आई,
शैल-शिखर से चली सलोनी, सागर-सीमा तक छाई।
कंकड़-कण में मंत्र जगाती, तट पर नूपुर बजाती,
मौन दिशाओं के अधरों पर, अनहद स्वर बरसाती।
क्षण-क्षण में जीवन बहा, अपनी छवि स्वयं सँवारा,
बाहर जितना पंथ खुला था, भीतर उतना ही उजियारा।
बिंदु-बिंदु में सिंधु समाया, देह बनी क्षणिक धारा,
स्वत्व-विसर्जन जहाँ हुआ, खुला अनंत किनारा।
बहना ही जीवन का रहस्य, ठहराव स्वयं अंधकार,
अर्पित होकर जो मिट जाए, उसमें जागे सत्य अपार।
- सनातन मुकुंद