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प्रवाह का ब्रह्मरहस्य : रहस्यवादी–दार्शनिक गीतिका

                
                                                         
                            नील-वसन धरती के तन पर, रजत-रेखा-सी आई,
                                                                 
                            
शैल-शिखर से चली सलोनी, सागर-सीमा तक छाई।

कंकड़-कण में मंत्र जगाती, तट पर नूपुर बजाती,
मौन दिशाओं के अधरों पर, अनहद स्वर बरसाती।

क्षण-क्षण में जीवन बहा, अपनी छवि स्वयं सँवारा,
बाहर जितना पंथ खुला था, भीतर उतना ही उजियारा।

बिंदु-बिंदु में सिंधु समाया, देह बनी क्षणिक धारा,
स्वत्व-विसर्जन जहाँ हुआ, खुला अनंत किनारा।

बहना ही जीवन का रहस्य, ठहराव स्वयं अंधकार,
अर्पित होकर जो मिट जाए, उसमें जागे सत्य अपार।
- सनातन मुकुंद
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49 मिनट पहले

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