नील गगन के कुंतल सँवरे, अरुण-राग मुसकाया है,
माटी के मौन अधर पर फिर, मधु-ऋतु ने गीत सुनाया है।
पल्लव ने पवन की उँगली थाम, हरित वीणा छेड़ी है,
ओस-कणों में भोर ने अपनी, चाँदी की बिंदी घेरी है।
निर्झर की झंकारों में कोई, अनकहा मंत्र उतरता है,
शैल-शिखर के धवल मौन में, सूर्य-बीज-सा खिलता है।
कुसुम-कपोलों पर मधुकर ने, गूँजित स्वप्न सजाए हैं,
तितली के पंखों पर जैसे, इंद्रधनुष झुक आए हैं।
वन-वीथी में कोयल की तान, तम के तंतु चीर गई,
सुप्त धरा की नाड़ी में फिर, ऋतु-सुधा झरती गई।
सूर्य-किरण जब सिंधु-लहर पर, स्वर्ण-शंख बजाती है,
धरती अपने कण-कण में फिर, सृष्टि-ऋचा दोहराती है।
यह केवल ऋतु का रूप नहीं—यह चेतन का मधुमास है,
प्रकृति के नव शृंगार तले, जीवन का नव उल्लास है।
जहाँ झरे मन के पतझर, वहाँ पल्लव मुसकाएँ,
बाहर ऋतु का रूप खिले, भीतर दीप जलाएँ।
- सनातन मुकुंद