हिम-आँचल पर घाव, क्षितिज पर प्रभात मुस्काए,
किरच-किरच सपनों से फिर जीवन झिलमिलाए।
राख तले अंगार दहकें, शिराओं में जीवन गाए—
नेपाल फिर से मुस्काए, नेपाल फिर से मुस्काए।
मलबे में सोई तुलसी फिर हरित श्वास जगाए,
सूनी चौखट पर बाल-हँसी किलकारी बन आए।
ईंट नहीं, विश्वास उठे; घर फिर घर कहलाए—
नेपाल फिर से मुस्काए, नेपाल फिर से मुस्काए।
धरती की गहरी दरारों में, वर्षा के बीज उतरें,
बंजर पलकों पर हरित स्वप्नों के दीप निखरें।
झंझा चाहे पर्वत तोड़े, दीप कहाँ बुझ पाए—
नेपाल फिर से मुस्काए, नेपाल फिर से मुस्काए।
गंगा हिम की पीड़ा लेकर, करुणा की धारा बहे,
सीमा के सारे अक्षर जल में घुलकर अविरल बहें।
मन से मन का सेतु बने, दूरी स्वयं मिट जाए—
नेपाल फिर से मुस्काए, नेपाल फिर से मुस्काए।
पशुपति की घंटी गूँजे चहुँदिश, बुद्ध-करुणा बरसे,
शोक-रात्रि के पार हिम-क्षितिज पर अरुणिमा हँसे।
हिमगिरि-सा धैर्य जगे, नव-युग शिखरों पर आए—
नेपाल फिर से मुस्काए, नेपाल फिर से मुस्काए।
- सनातन मुकुंद