कौशल से जो दूर भागते, दोष जगत पर मढ़ते हैं,
अपनी ही दुर्बलता को वे, भाग्य कहकर सहते हैं।
अवसर हर आँगन में खिलते, दृष्टि उन्हें पहचान सके,
जीत उसी के चरण चूमती, जो संघर्ष निभा सके।
बाँसुरी रूठी नहीं कभी भी, सुर ही साधे जाते हैं,
मन के बिखरे तार सँभलें, तब मधुर गीत सुनाते हैं।
राह नहीं बदनाम कभी है, थकते केवल पाँव यहाँ,
मंज़िल उसका नाम लिखेगी, जिसने हार न मानी जहाँ।
कर्मों से पहचान बनाओ, व्यर्थ न कारण गिनते रहो,
स्वप्न तभी साकार बनेंगे, जब श्रम से नाता गढ़ो।
जो अपनी दुर्बलता ढाँपे, वह कब ऊँचा उठ पाएगा?
"नाच न जाने, आँगन टेढ़ा" कहने से क्या हो जाएगा?
- सनातन मुकुंद