शून्य-गगन की निस्तब्धता में, कौन अनाहत नाद है,
कण-कण के मौन अधरों पर, किसका अमृत-प्रसाद है।
काल, नियति, स्वभाव, संयोग—किससे यह संसार हुआ,
किस चेतन के सूक्ष्म स्पंदन से, दृश्य-जगत् साकार हुआ।
अव्यक्त गर्भ से प्रकृति फूटी, रूप अनेक सँवरने लगे,
एक अदृश्य चेतन-सूत्र से, जड़-कण चेतन भरने लगे।
माया के बहुरंगी पट पर, विश्व-विलास निराला है,
मायिन् छिपा स्वयं परदे में, फिर भी जग में उजियाला है।
नाम-रूप के मेघ घने हैं, सत्य-सूर्य पर छाए हैं,
दृश्य-जगत् के मोह-जाल में, जीव स्वयं को भुलाए हैं।
एक ही रवि की किरणें बनकर, असंख्य दीपक जलते हैं,
एक चैतन्य-स्रोत से निकले, जीव-तरंग बन पलते हैं।
कर्मों के सूक्ष्म बीज हृदय में, जन्म-जन्म तक सोते हैं,
वासना के उर्वर वन में पड़कर, फिर भव-बन्धन बोते हैं।
मोह-मरीचि के पीछे भागा, पथिक स्वयं को भूल गया,
कर्तापन के घने कुहासे में, निज सुधा-निधि से दूर गया।
जब भोगों की क्षणभंगुरता ने, मन में प्रश्न जगाया है,
“मैं कौन?” की मौन पुकार ने, अंतर-द्वार खुलाया है।
जब अंतर्मन की वीणा जागी, श्वास बनी मंत्रों की तान,
मौन हुआ जब चित्त-सरोवर, उसमें झलका दिव्य विधान।
इन्द्रिय-घोड़े थमे लगामें, प्राण हुए निर्मल-प्रशांत,
अंतर-दीप जला तो भीतर, फूटा चेतन-प्रभात।
ॐ की सूक्ष्म अनाहत ध्वनि में, मन-पंछी लीन हुआ,
बूँद सागर में विलीन हुई, सागर बूँद में प्रकट हुआ।
द्रष्टा जब दृश्य से अलग हुआ, साक्षी-ज्योति जगी भीतर,
क्षणभंगुर आवरणों के पीछे, दीख पड़ा अविनाशी अंतर।
न वह बाहर, न भीतर, न वह सीमित, न आकार कहीं,
जिसे खोजता रहा जग सारा, वह तो था अंतःसार यहीं।
रुद्र वही जो कालातीत है, रुद्र वही जो प्राणों में,
रुद्र वही जो ज्योति बनकर, हरता तम अज्ञानों में।
विश्व-वृक्ष की शाखाओं में भी, एक जड़ का विस्तार है,
जीव-जीव के अंतर में भी, उसी चेतन की झंकार है।
जब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय की, तीनों सीमाएँ गलती हैं,
तब आत्मा की शांत गुहा में, ब्रह्म-ज्योतियाँ खिलती हैं।
कर्म-जाल के तंतु कटते ही, कर्तापन का क्षय हुआ,
ज्ञानाग्नि में बीज जलते ही, जन्म-मरण का भय गया।
माया का पट हटते ही फिर, दृश्य-जगत् निस्तब्ध हुआ,
जिसको जग कहते आए, ब्रह्मस्वरूप वह सिद्ध हुआ।
नाद वही, ज्योति वही है, वही शून्य, साकार वही,
जीव, जगत् और परम तत्त्व में, एक अखंड आधार वही।
कृपा कहीं आकाश से उतरे, ऐसा केवल भाव नहीं,
स्वयं प्रकाशित सत्य प्रकट हो, जब मन में आवरण नहीं।
मृत्यु-द्वार के उस पार खुला, अमृतत्व का दिव्य द्वार,
अहं-बूँद जब शून्य हुई तो, मिला चेतन-सागर अपार।
अंतिम पग पर पथ भी गलता, पथिक स्वयं जब शेष नहीं,
सागर में मिल जाती सरिता, फिर सरिता का देश नहीं।
मौन हुआ जब प्रश्न समूचा, उत्तर स्वयं प्रकाश बना,
मायापटल के पार खड़ा था, जो खोज रहा—वही बना।
-श्री सनातन मुकुंद