मुरली की मधुरिम तान सुन, सुध-बुध अपनी खो बैठी,
श्याम-रंग की अमृत-धारा में, मीरा स्वयं समा बैठी।
राजमहल के स्वर्ण-कपाटों में, मन उसका न बँध पाया,
मोहन-मूर्ति के नयनों में ही, अपना लोक बसाया।
पायल बनी प्रणय की भाषा, नर्तन बना समर्पण,
चरण-कमल की धूलि बन गया, उसका सारा जीवन।
लोक-लाज के दीप बुझाकर, प्रेम-ज्योति वह धरती,
विष का प्याला पीकर भी वह, हरि-नाम सुधा-सी भरती।
विरह-विहग जब पंख पसारे, नयनों में घन छाए,
एक-एक श्वास में गिरधर के, मधुरिम नाम समाए।
रेत बनी संसार की माया, श्याम बने जलधारा,
सूने अंतर-वन में खिल उठा, प्रेम-कमल मनोहारा।
तन राजसी, मन राधा-सा, प्राण बने अनुरागी,
जग के बंधन तोड़ दिए सब, श्याम-रंग में रंगी।
बाँसुरी की एक पुकार पर, राज-पाट सब त्यागा,
कण-कण में गिरधर को देखा, रोम-रोम अनुरागा।
नयन बने यमुना की लहरें, हृदय बना वृंदावन,
श्वास-श्वास में रास रचाया, हरि ही बने आराधन।
प्रेम जहाँ निष्काम हो जाए, भक्ति वहाँ मुस्काती,
मीरा की अनन्य साधना, युग-युग राह दिखाती।
श्याम मिले तो मिट गया जग, मिटा देह का भान,
प्रेम-दीप में स्वयं पिघलकर, बन गई मीरा गान।
- सनातन मुकुंद